कहते हैं कि दमन के खिलाफ आवाज उठने में देर भले हो, लेकिन जब वो आवाज अपनी परवाज पाती है, तो बदलाव निश्चित रूप से दिखाई पड़ने लगते हैं, लेकिन ऐसी आवाजों को हमेशा कुचला जाता रहा है.
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